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    15-03-2026 : पर्वतीय संस्कृति संरक्षण समिति द्वारा आयोजित फूलदेई संक्रांति महोत्सव में माननीय राज्यपाल महोदय का सम्बोधन

    प्रकाशित तिथि : मार्च 15, 2026

    जय हिन्द!

    मेरे प्यारे नन्हें-मुन्ने बच्चों, उत्तरखण्ड की संस्कृति के नन्हें प्रहरियों, पर्वतीय संस्कृति संरक्षण समिति के सभी समर्पित सदस्यगण और यहाँ उपस्थित देवतुल्य अभिभावकगण! आप सभी को फूलदेई लोकपर्व की हार्दिक बधाई!

    आज लोक भवन का आंगन फूलों की खुशबू से ही नहीं, बल्कि आप जैसे प्यारे बच्चों की मुस्कान से भी महक उठा है। आप सबके उत्साह, मुस्कान और ऊर्जा को देखकर मन आनंद और गर्व से भर गया है। सचमुच, आप सभी देवभूमि उत्तराखण्ड के वे जीवंत पुष्प हैं जो हमारे समाज और संस्कृति को सुगंधित बनाएंगे।

    आज आपने अपनी छोटी-छोटी डलियों (टोकरियों) में जो फूल सजाए हैं, वे केवल फूल नहीं हैं, बल्कि हमारी देवभूमि की महान संस्कृति की महक हैं। आज आप जिस पारंपरिक वेशभूषा में यहाँ आए हैं, उसे देखकर मेरा मन अत्यंत प्रफुल्लित है। आप केवल बच्चे नहीं हैं, बल्कि हमारी महान पहाड़ी संस्कृति के ‘नन्हें ब्रांड एंबेसडर’ हैं।

    मेरे प्यारे बच्चों,

    ‘‘फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार।’’
    इन शब्दों में कितना गहरा दर्शन छिपा है!

    इन शब्दों का अर्थ कितना सुंदर है! आप जब घर-घर जाकर फूल डालते हैं, तो आप केवल फूल नहीं, बल्कि उस परिवार के लिए सुख, समृद्धि और क्षमा की कामना करते हैं। दूसरों के द्वार पर खुशियाँ ले जाने की यह परंपरा हमें एक अच्छा इंसान बनाएगी।

    फूलदेई हमें प्रकृति का सम्मान करना सिखाती है। जैसे फूल बिना किसी भेदभाव के सबको खुशबू देते हैं, वैसे ही आप भी अपने व्यवहार से समाज को सुंदर बनाएं। मेरा एक छोटा सा अनुरोध है- इस फूलदेई पर आप सभी ‘एक पौधा’ जरूर लगाएं और उसे अपने दोस्त की तरह बढ़ते हुए देखें।

    बच्चों! प्रकृति की रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है। पेड़-पौधों और फूलों से प्रेम कीजिए और अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखिए। जब हम प्रकृति का सम्मान करते हैं, तब प्रकृति भी हमें खुशियों से भर देती है।

    आज आपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ जो लोकगीत गाए हैं, उनकी मिठास सबसे अलग है। हमारे उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति बहुत समृद्ध और गौरवशाली है। हमारे लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्र हमारी पहचान हैं। इन्हें सीखना और आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

    मैं एक सैनिक रहा हूँ, और मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रदेश का हर बच्चा एक सैनिक की तरह अनुशासित और निडर बने। पहाड़ के बच्चों के स्वभाव में साहस और धैर्य होता है। आप खूब पढ़ाई करें, कम्प्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीक सीखें, लेकिन अपनी पहाड़ी भाषा और लोक गीतों को कभी न भूलें। तकनीक आपकी शक्ति है और संस्कृति आपकी जड़ है।

    आप सभी हमारे प्रदेश और देश के भविष्य के निर्माता हैं। आप जितना अधिक पढ़ाई में आगे बढ़ेंगे और अपने संस्कारों को मजबूत बनाएंगे, उतना ही हमारा समाज और हमारा देश मजबूत होगा। शिक्षा हमें ज्ञान देती है और संस्कार हमें सही दिशा देते हैं।

    मेरे प्रिय बच्चों,

    जब वर्ष 2047 में भारत अपनी आजादी के 100 साल पूरे करेगा, तब आप में से ही कोई डॉक्टर बनेगा, कोई इंजीनियर, कोई वैज्ञानिक और शायद कोई मेरी तरह राज्यपाल भी बनेगा। आप आज से ही बड़े सपने देखें और उन सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करें।

    मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि पर्वतीय संस्कृति संरक्षण समिति पिछले कई वर्षों से इस सुंदर लोकपर्व को बड़े उत्साह के साथ आयोजित कर रही है। यह अत्यंत सराहनीय प्रयास है, क्योंकि ऐसे आयोजन हमारी संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। मैं समिति के सभी पदाधिकारियों और सहयोगियों को इसके लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।

    संस्कृति के नन्हें प्रहरियों,

    आपकी टोकरियों के ये फूल और आपके चेहरों की चमक मुझे विश्वास दिलाती है कि हमारी देवभूमि का भविष्य सुरक्षित है। आप यहाँ से खूब सारी खुशियाँ और मेरा आशीर्वाद लेकर जाएँ।

    आप सभी अपने जीवन में आगे बढ़ें, खूब पढ़ें, अच्छे संस्कार अपनाएँ और अपने माता-पिता, गुरुजनों तथा देश का नाम रोशन करें। यही मेरी आप सभी के लिए शुभकामना है।

    हमेशा याद रखें! ‘‘स्वस्थ रहें, मस्त रहें और अपनी मिट्टी से जुड़े रहें।’’ मैं फिर से आप सभी को फूलदेई पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आपके जीवन में सदैव खुशियों के फूल खिलते रहें और आपका भविष्य उज्ज्वल बने।

    जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!