24-02-2026-राष्ट्रीय सैनिक संस्था के 18 वें राष्ट्रीय अधिवेशन के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
आज दिल्ली की इस ऐतिहासिक धरा पर, जहाँ सत्ता नहीं, संकल्प आकार लेता है, और राष्ट्रवाद की ऊर्जा अपनी पराकाष्ठा पर है, आप सभी के मध्य उपस्थित होना मेरे लिए केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और राष्ट्रीय गौरव का क्षण है। सर्वप्रथम, मैं मंच पर उपस्थित ऋषि-तुल्य विभूतियों, पूर्व सैन्य अधिकारियों, वीर नारियों और राष्ट्र के सजग प्रहरियों का हृदय से अभिनंदन करता हूँ।
मैं राष्ट्रीय सैनिक संस्था को अपने इस 18वें राष्ट्रीय अधिवेशन की हार्दिक बधाई देता हूँ। यह संस्था केवल पूर्व सैनिकों का संगठन नहीं, बल्कि हमारे गौरवशाली अतीत और ऊर्जावान भविष्य के बीच एक ‘राष्ट्रवादी सेतु’ है। आपके द्वारा आपदा राहत, युवाओं के मार्गदर्शन और सामाजिक जागरूकता में जो योगदान दिया जा रहा है, वह अत्यंत सराहनीय है। आपने अनुभव और युवा ऊर्जा को एक सूत्र में पिरोकर जिस राष्ट्र चेतना को जीवित रखा है, वह वंदनीय है। वास्तव में, वर्दी उतरने के बाद भी एक सैनिक का उत्तरदायित्व कभी समाप्त नहीं होता।
हमारे सेवानिवृत्त सैनिक हमारे समाज की चलती-फिरती अकादमी हैं। दुर्गम पहाड़ों, रेगिस्तानों और जंगलों में अर्जित आपका अनुभव आज शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण की अमूल्य शक्ति बन सकता है। आप रिटायर हुए हैं-आपके भीतर का योद्धा नहीं। यही भारतीय सैनिक की सबसे बड़ी पहचान और सबसे बड़ी शक्ति है। सैनिक का जीवन केवल युद्ध नहीं- वह अनुशासन, धैर्य और कर्तव्य का जीवंत पाठ है। यदि यही गुण नागरिक जीवन में उतर जाएँ, तो भारत को विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता।
साथियों,
‘वीरभूमि’ उत्तराखण्ड की पावन धरा उन जांबाजों की जननी है जिनके शौर्य की गाथाएं हिमालय की चोटियों पर अंकित हैं। यहाँ का हर घर राष्ट्र रक्षा की एक छोटी छावनी है, जहाँ एक माँ अपने बेटे को लोरी सुनाते समय केवल संस्कार नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए मर-मिटने का संकल्प भी देती है। इस प्रदेश की सेवा करना मेरे लिए ईश्वर की सेवा के समान है।
वर्तमान में देश की आंतरिक सुरक्षा हमारे लिए अत्यंत गंभीर विषय है। हमारे पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ‘ढाई फ्रंट’ की चुनौती का जिक्र करते थे। इसमें ‘आधा फ्रंट’ हमारे ही भीतर छिपे उन तत्वों का है जो समाज को अस्थिर करना चाहते हैं। इस दिशा में राष्ट्रीय सैनिक संस्था की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
साथियों,
आज युद्ध केवल सरहदों पर नहीं, बल्कि सूचनाओं और विचारधाराओं के माध्यम से हमारे घरों तक पहुँच चुका है। ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ के इस दौर में, जहाँ भ्रामक सूचनाएं और कट्टरपंथ को हथियार बनाया जा रहा है, राष्ट्रीय सैनिक संस्था की भूमिका एक ‘सजग प्रहरी’ की है। जब सेना का अनुशासन नागरिक समाज के साथ मिलता है, तो वह एक ऐसा अभेद्य कवच बनाता है जिसे कोई भी आंतरिक चुनौती भेद नहीं सकती।
इतिहास साक्षी है कि भारत की अखंडता के लिए हमारे सैनिकों ने सर्वाेच्च बलिदान दिए हैं। विभाजन की विभीषिका हो या कश्मीर में आतंकवाद के विरुद्ध लंबी लड़ाई-भारतीय सैनिकों ने सदैव ‘राष्ट्र सर्वाेपरि’ के मंत्र को जीया है। आज केंद्र सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने आतंकवाद पर अंकुश लगाया है, पर छद्म युद्ध से निपटने के लिए समाज के भीतर एक ‘अनुशासित नेटवर्क’ की आवश्यकता है।
भविष्य की सुरक्षा के लिए हमें तकनीक और ‘राष्ट्र-प्रथम’ के भाव का संगम करना होगा। हमें अपने गौरव सेनानियों के अनुभव को साइबर जागरूकता, डिजिटल सुरक्षा और युवा प्रशिक्षण से जोड़ना होगा ताकि वे साइबर स्पेस में भी देश की ढाल बन सकें।
‘अग्निपथ’ जैसी योजनाएं केवल करियर विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्र के चरित्र निर्माण का महा-अनुष्ठान हैं। सेना में बिताए गए वे चार वर्ष एक युवा को वह आत्मविश्वास देंगे जो दुनिया की कोई डिग्री नहीं दे सकती। मेरा युवाओं से आह्वान है, आगे बढ़िए और ‘राष्ट्र रक्षा’ को अपना धर्म बनाइए। युवा जोश और पूर्व सैनिकों का अनुभव मिलकर गांवों और शहरों में सुरक्षा की ऐसी पहली पंक्ति तैयार करें, जहाँ देशविरोधी तत्वों को पैर रखने की जगह न मिले।
साथियों,
आज जब मैं बेटियों को हर क्षेत्र में शिखर छूते देखता हूँ, तो गर्व से मस्तक स्वयं ऊँचा हो जाता है। आज नारी केवल घर की दहलीज तक सीमित नहीं है, वह आकाश में युद्धक विमान उड़ा रही है और सीमाओं पर दुश्मन की आँखों में आँखें डालकर खड़ी है। हमारी बेटियों ने सैन्य क्षेत्र में जो कीर्तिमान रचे हैं, वे सम्पूर्ण राष्ट्र की नारी शक्ति का उद्घोष हैं। हमारी सेना का यह समावेशी स्वरूप ही नए भारत की वास्तविक शक्ति है, जहाँ साहस का कोई लिंग नहीं होता।
सीमाएँ केवल हथियारों से नहीं, वहाँ बसने वाले नागरिकों के अटूट विश्वास से भी सुरक्षित होती हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की ‘वाइब्रेंट विलेज’ सोच ने सीमावर्ती क्षेत्रों की परिभाषा ही बदल दी है। अब सीमा के गाँव “अंतिम गाँव” नहीं-देश के “प्रथम गाँव” हैं। वहाँ सेना और नागरिक मिलकर सुरक्षा और समृद्धि की नई इबारत लिख रहे हैं। पलायन रोकना और सीमांत क्षेत्रों को सशक्त बनाना आज राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।
सैनिकों और उनके परिवारों का सम्मान राष्ट्र की सर्वाेच्च प्राथमिकता है। सरकार ने वन रैंक वन पेंशन जैसी दशकों पुरानी माँग को पूरा कर यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अपने नायकों के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र है। वीर नारियों का सशक्तीकरण हो, युद्ध स्मारकों का निर्माण हो या सैनिक परिवारों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वरोजगार- हर स्तर पर संवेदनशील और ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।
आज हम उस युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ युद्ध के मैदान भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़ चुके हैं। एआई, ड्रोन और साइबर सुरक्षा अब सेना के अनिवार्य आयाम बन गए हैं। आत्मनिर्भर भारत की भावना के साथ स्वदेशी रक्षा प्रणालियाँ हमारे वैज्ञानिकों और अभियंताओं के सामर्थ्य का प्रमाण हैं। भारत आज रक्षा क्षेत्र में आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है, और तकनीक के इस युग में वैश्विक नेतृत्व के लिए पूर्णतः तैयार है।
आज देश में अभूतपूर्व गति से एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डे और रेल नेटवर्क का विस्तार हो रहा है, करोड़ों नागरिक डिजिटल सेवाओं से सीधे जुड़ चुके हैं, “मेक इन इंडिया” के तहत स्वदेशी तकनीक वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रही है, और युवा उद्यमिता भारत को नवाचार की राजधानी की ओर ले जा रही है।
आज का नया भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ राष्ट्र है- जो सपने देखता ही नहीं, उन्हें साकार भी करता है। कुछ ही वर्षों में हमने वह कर दिखाया है जो कभी असंभव प्रतीत होता था। चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने से लेकर रक्षा निर्यात में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ, डिजिटल लेन-देन में वैश्विक नेतृत्व और अंतरिक्ष, आधारभूत ढाँचे तथा स्टार्ट-अप नवाचार में नई ऊँचाइयाँ। भारत आज विश्व पटल पर सामर्थ्य और संकल्प का पर्याय बन चुका है।
साथियों, यही तो नया भारत है। जो रुकता नहीं, झुकता नहीं- नेतृत्व करता है। जो संकट में भी अवसर खोजता है, और हर चुनौती को उपलब्धि में बदल देता है। आज भारत केवल उभरती हुई शक्ति नहीं, एक निर्णायक वैश्विक आवाज बन चुका है। मैं देश के युवाओं से विशेष रूप से कहना चाहता हूँ- आप केवल नौकरी खोजने वाली पीढ़ी नहीं हैं, आप राष्ट्र गढ़ने वाली पीढ़ी हैं। आपके विचार, आपका नवाचार और आपका अनुशासन, यही विकसित भारत की असली पूँजी है।
और आज मैं विशेष रूप से वीर नारियों को नमन करता हूँ, आप केवल शहीदों की स्मृति नहीं, राष्ट्र की जीवित प्रेरणा हैं। आपके धैर्य में भारत की शक्ति है, और आपके साहस में भारत का भविष्य। मैं उन माताओं के चरणों में भी शीश झुकाता हूँ, जिनकी कोख ने ऐसे वीरों को जन्म दिया जो तिरंगे की आन के लिए मुस्कुराते हुए बलिदान हो गए।
साथियों,
सेना में न कोई जाति होती है, न प्रांत। वहाँ केवल तिरंगा ही सैनिक की आन-बान और शान है। यही सामाजिक समरसता हमारे समाज का सबसे बड़ा आदर्श है। जब हम छोटे मतभेदों से ऊपर उठकर “राष्ट्र सर्वाेपरि” के भाव से कार्य करेंगे, तभी एक अखंड, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव होगा। सैनिक हमें सिखाते हैं कि राष्ट्र प्रथम केवल कहा नहीं जाता, जिया जाता है।
अंत में, मेरा आप सभी से आह्वान है कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक एक सैनिक की भांति अपनी भूमिका निभाए। याद रखिए! हम जहाँ भी रहें, जो भी करें, अपने कर्म से राष्ट्र को गौरव दें, अपने चरित्र से भारत को पहचान दें, और अपने संकल्प से तिरंगे को नई ऊँचाइयाँ दें।
आइए, हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा लें- विकसित भारत केवल सरकार का लक्ष्य नहीं, हम सबका जीवन-धर्म होगा। राष्ट्र प्रथम केवल नारा नहीं, हमारी दैनिक साधना होगी। और जब इतिहास 2047 में मुड़कर देखे, तो कहे, इस पीढ़ी ने भारत को सुरक्षित भी बनाया, समर्थ भी और विश्व का मार्गदर्शक भी। इसी भावना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!