20-02-2026 : अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन
जय हिन्द!
आज इस गौरवशाली दिन के इस पावन अवसर पर आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष और गौरव की अनुभूति हो रही है। सर्वप्रथम मैं, लोकभवन उत्तराखण्ड में आप सभी का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ।
आज का दिन अत्यंत विशेष है। आज भारत के मानचित्र पर उदित दो तेजस्वी राज्यों, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम का स्थापना दिवस है। इस सुअवसर पर, मैं लोक भवन और समस्त उत्तराखण्ड वासियों की ओर से आप दोनों राज्यों के निवासियों को अपनी हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं प्रेषित करता हूँ।
भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ भाषाएँ भिन्न हैं, पर भाव एक है। वेशभूषा अलग है, पर विचार एक है। परंपराएँ विविध हैं, पर राष्ट्रभाव एक है। स्थापना दिवस के आयोजन इसी भावनात्मक एकात्मता को सशक्त करने का माध्यम है। यह अभियान हमें यह स्मरण कराता है कि भौगोलिक दूरियाँ हमें अलग नहीं करतीं, बल्कि विविधता हमें और अधिक समृद्ध बनाती है।
मित्रों,
आज का यह समारोह ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के उस महान संकल्प का उत्सव है, जिसका स्वप्न हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने देखा है। यह उत्सव, दूरी को निकटता में बदलने का, विविधता को एकता में पिरोने का और हिमालय के एक छोर (उत्तराखण्ड) का दूसरे छोर (पूर्वाेत्तर) से मिलन का उत्सव है।
सबसे पहले बात उस भूमि की, जहाँ सूर्य अपनी प्रथम किरण से भारत माता का अभिषेक करता है। अरुणाचल प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता का सजग प्रहरी है। तवांग की बर्फीली चोटियों से लेकर परशुराम कुंड की पवित्रता तक, अरुणाचल की मिट्टी के कण-कण में राष्ट्रभक्ति रची-बसी है।
मुझे गर्व होता है यह जानकर कि अरुणाचल में ‘नमस्ते’ के स्थान पर ‘जय हिंद’ कहना एक परंपरा है। वहां की जनजातीय संस्कृति- चाहे वह ‘आदि’ हो, ‘मिशमी’ हो या ‘निशी’ हो, वो अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ, अरुणाचल हमारी आध्यात्मिक चेतना का भी केंद्र है। उत्तराखण्ड की तरह ही वहां के ऊंचे पर्वत और कल-कल करती नदियां हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना सिखाती हैं।
वहीं दूसरी ओर, मिजोरम पहाड़ों के बीच बसा एक ऐसा राज्य है जिसने पूरे देश को ‘शांति’ और ‘सामाजिक अनुशासन’ का पाठ पढ़ाया है। मिजोरम की साक्षरता दर और वहां का नागरिक बोध (ब्पअपब ैमदेम) प्रशंसनीय है।
मिजो संस्कृति का ‘चेराव’ नृत्य हो या ‘चापचर कुट’ जैसा उल्लासमय त्योहार, यह सब हमें सिखाते हैं कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी जीवन को कैसे उत्सव बनाया जाता है। मिजोरम के लोगों का संगीत के प्रति प्रेम और उनकी मेहमान-नवाजी हमें देवभूमि के ‘अतिथि देवो भव’ की याद दिलाती है।
भाइयों और बहनों,
उत्तराखण्ड, अरुणाचल और मिजोरम इन तीनों राज्यों की आत्मा एक है। हम ‘हिमालय के पुत्र’ हैं। चाहे वह कठिन भौगोलिक परिस्थितियां हों, या सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा का दायित्व या फिर अपनी प्राचीन लोक-परंपराओं को आधुनिकता के बीच बचाए रखने का संघर्ष। हमारी चुनौतियां एक जैसी हैं, और हमारी सामथ्र्य भी एक जैसी है।
इन सीमांत राज्यों की सामरिक भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा में उत्तराखण्ड की तरह इन प्रदेशों के युवाओं का योगदान उल्लेखनीय रहा है। देश की सेना और अर्द्धसैनिक बलों में पूर्वाेत्तर के वीर जवानों की बहादुरी और समर्पण राष्ट्र को सदैव गौरवान्वित करता है।
युवा शक्ति किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूँजी होती है। खेल, शिक्षा, प्रशासन और उद्यमिता के क्षेत्र में इन राज्यों के युवाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से भी मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश प्रेरणास्रोत हैं। यहाँ महिलाओं की सामाजिक भागीदारी और नेतृत्व उल्लेखनीय है। यह हमें स्मरण कराता है कि जब नारी सशक्त होती है, तब समाज सशक्त होता है, और जब समाज सशक्त होता है, तब राष्ट्र सशक्त होता है।
आज जब भारत “विकसित भारत 2047” के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब पूर्वाेत्तर भारत विकास की नई उड़ान भर रहा है। बेहतर सड़क संपर्क, डिजिटल कनेक्टिविटी, पर्यटन और बुनियादी ढाँचे के विस्तार ने इन राज्यों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से और अधिक सशक्त रूप से जोड़ा है। ।बज म्ंेज च्वसपबल के अंतर्गत पूर्वाेत्तर भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क का सशक्त सेतु बन रहा है।
सीमांत क्षेत्रों का सशक्तीकरण राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है। आज ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ के माध्यम से हमारे सीमावर्ती गांव, जो कभी देश के ‘अंतिम गांव’ कहे जाते थे, अब देश के ‘प्रथम गांव’ बनकर उभर रहे हैं। चाहे उत्तराखण्ड का ‘माणा’ हो या अरुणाचल का ‘किबिथू’, विकास की किरण अब हर आंगन तक पहुँच रही है।
पर्यटन और पारिस्थितिकी के क्षेत्र में भी इन राज्यों में अपार संभावनाएँ हैं। इको-टूरिज्म, साहसिक पर्यटन और सांस्कृतिक पर्यटन के माध्यम से स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। हमें पर्यटन के क्षेत्र में भी एक-दूसरे से सीखना है। पूर्वाेत्तर की ‘होमस्टे’ व्यवस्था और वहां का ‘इको-टूरिज्म’ हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
साथियों,
हम सभी जानते हैं कि भारत ‘विविधता में एकता’ का जीवंत उदाहरण है। हमारे देश के हर राज्य की अपनी विशिष्ट पहचान, भाषा, कला, संस्कृति और परंपराएँ हैं। यह हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। अनेकता में एकता ही भारत की विशेषता है, और यही हमें विश्व में अद्वितीय बनाती है।
जब हम राष्ट्रहित को जीवन का प्रथम और अंतिम मानक बनाएँगे, तभी विकसित भारत का स्वप्न साकार होगा। इस अवसर पर यहाँ उपस्थित युवाओं से मैं विशेष रूप से कहना चाहता हूँ- भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में है। हमें एक-दूसरे की भाषा को समझना होगा, एक-दूसरे के इतिहास को जानना होगा।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि भारत एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें अलग-अलग राज्यों के फूल अपनी-अपनी महक बिखेर रहे हैं। अरुणाचल की ‘उगती किरण’ और मिजोरम की ‘शांत वादियां’ मिलकर भारत के मस्तक को ऊंचा कर रही हैं।
आइए! हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि भौगोलिक दूरियां हमारे दिलों की दूरी कभी नहीं बनेंगी। हम सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इस सिलसिले को और अधिक प्रगाढ़ करेंगे, परस्पर संवाद और सहयोग को बढ़ाएँगे और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर एकजुट होकर अग्रसर होंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम के स्थापना दिवस पर वहाँ की जनता को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
जय हिंद!