22-02-2026 : “दिव्य कला मेला” कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन
जय हिन्द!
देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन एवं प्रेरणादायी धरती पर आयोजित “दिव्य कला मेला” कार्यक्रम के अवसर पर आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष, संतोष और आत्मगौरव का अनुभव हो रहा है।
मैं इस गरिमामय अवसर पर माननीय राज्य मंत्री, भारत सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, श्री बी. एल. वर्मा जी, विशिष्ट अतिथियों, जनप्रतिनिधियों, विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों, मीडिया के साथियों, तथा विशेष रूप से हमारे प्रेरणास्रोत दिव्यांग भाई-बहनों का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।
आज का यह आयोजन केवल एक मेला नहीं है। यह आत्मनिर्भर दिव्यांग भारत की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह उन प्रतिभाओं का उत्सव है, जो परिस्थितियों को चुनौती देकर उन्हें अवसर में रूपांतरित करती हैं। यहाँ प्रदर्शित प्रत्येक उत्पाद, प्रत्येक कला-कृति और प्रत्येक प्रस्तुति यह संदेश देती है कि दिव्यांगता बाधा नहीं, बल्कि अदम्य संकल्प, आत्मबल और रचनात्मक क्षमता का प्रतीक है।
देवियों और सज्जनों,
समावेशी विकास की अवधारणा तभी सार्थक होती है, जब समाज का कोई भी वर्ग विकास की मुख्यधारा से वंचित न रहे। दिव्यांगजन केवल सहानुभूति के पात्र नहीं हैं, वे सम्मान, अवसर और समान भागीदारी के अधिकारी हैं। वे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय सहभागी हैं। जब उन्हें मंच, संसाधन और विश्वास मिलता है, तब राष्ट्र की सामूहिक ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।
दिव्य कला मेला हमारे राष्ट्रीय सशक्तीकरण संकल्प का सशक्त प्रतीक है। देहरादून में आयोजित यह 30वाँ संस्करण इस सतत यात्रा का महत्वपूर्ण चरण है। देशभर में आयोजित पूर्व के 29 मेलों में 2362 प्रतिभागियों की सहभागिता से दिव्यांग उद्यमियों ने 23 करोड़ रुपये से अधिक की आय अर्जित की तथा 20 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण स्वीकृत हुए। ये उपलब्धियाँ दर्शाती हैं कि हम कल्याण की पारंपरिक अवधारणा से आगे बढ़कर स्वावलंबन आधारित सशक्तीकरण को प्रभावी रूप दे रहे हैं।
रोजगार मेलों के माध्यम से अब तक 3131 प्रतिभागियों ने भाग लिया है। इनमें से 1007 प्रतिभागी चयन प्रक्रिया में आगे बढ़े और 313 से अधिक को रोजगार के प्रस्ताव प्राप्त हुए। ये केवल आँकड़े नहीं, यह परिवर्तन की तीव्र गति एवं आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की उभरती शक्ति का प्रमाण हैं।
देहरादून में इस अवसर पर स्थापित लगभग 90 स्टॉल कौशल, नवाचार और उद्यमिता का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहे हैं। भारत सरकार की विभिन्न संस्थाएँ, सामाजिक संगठन और सहयोगी एजेंसियाँ भी इस आयोजन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। 26 फरवरी को प्रस्तावित रोजगार मेला दिव्यांग युवाओं के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों में नए अवसरों का द्वार खोलेगा।
केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा कौशल विकास, वित्तीय समावेशन, स्वरोजगार, विपणन सहयोग और प्रौद्योगिकी समर्थन के माध्यम से दिव्यांगजन को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय विकलांग वित्त एवं विकास निगम (छभ्थ्क्ब्) जैसे संस्थान रियायती वित्तीय सहायता और उद्यमिता समर्थन प्रदान कर दिव्यांग उद्यमियों को सशक्त आधार उपलब्ध करा रहे हैं। यह पहल केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि अवसर, विश्वास और गरिमा प्रदान करने का माध्यम है।
देवियों और सज्जनों,
यह मेला ‘लोकल फॉर वोकल’ के मंत्र को साकार रूप देता है। यहाँ प्रदर्शित उत्पाद केवल वस्तुएँ नहीं हैं, वे परिश्रम, समर्पण और आत्मविश्वास की जीवंत कहानियाँ हैं। जब हम इन उत्पादों को अपनाते हैं, तब हम केवल खरीदारी नहीं करते, हम सपनों को सहारा देते हैं, हम स्वाभिमान को सशक्त करते हैं, और हम आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला को मजबूत करते हैं।
इस आयोजन के अंतर्गत आयोजित खेल गतिविधियाँ- जैसे बोक्सिया प्रदर्शन, ब्लाइंड क्रिकेट और अन्य प्रतियोगिताएँ यह दर्शाती हैं कि खेल समावेशन का प्रभावी माध्यम है। खेल आत्मविश्वास, अनुशासन और टीम भावना का विकास करते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक सांस्कृतिक संध्या दिव्यांग कलाकारों की प्रस्तुति से सुसज्जित होगी, और 01 मार्च को आयोजित “दिव्य कला शक्ति” कार्यक्रम संघर्ष से सृजन तक की प्रेरक यात्रा का भव्य प्रदर्शन करेगा। यह केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवीय सामथ्र्य का उत्सव होगा।
साथियों,
समावेशन केवल नीतियों का विषय नहीं है, यह सामाजिक व्यवहार का विषय है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक अवसंरचना और डिजिटल सेवाएँ सभी के लिए सुगम और सुलभ हों। एक संवेदनशील समाज वही है, जहाँ विविधता को सम्मान मिले और प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ सके।
मैं विशेष रूप से युवाओं से आह्वान करना चाहता हूँ, आप इस परिवर्तन के वाहक बनें। दिव्यांगजनों के उत्पादों को प्रोत्साहित करें, उनके उद्यमों को सहयोग दें, और समावेशी समाज निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ। आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न तभी साकार होगा, जब हमारी युवा शक्ति संवेदनशील भी होगी और सहभागी भी।
उत्तराखण्ड करुणा, सेवा और कर्म की भूमि है। इस पावन धरा से समावेशन और संवेदना का संदेश पूरे राष्ट्र में प्रसारित हो, यही हमारी अपेक्षा है। जब नीति संवेदना से जुड़ती है और अवसर विश्वास से जुड़ता है, तब वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दृष्टिकोण में परिवर्तन लाएँ। दिव्यांगता को सीमा के रूप में नहीं, बल्कि विविधता के रूप में देखें। प्रत्येक व्यक्ति में निहित क्षमता को पहचानें। अवसर और संसाधन उपलब्ध कराएँ। और ऐसा वातावरण निर्मित करें, जहाँ कोई भी स्वयं को उपेक्षित या वंचित न समझे।
मेरे प्रिय साथियों,
भारत आज “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। यह केवल आर्थिक समृद्धि का संकल्प नहीं है, यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और गरिमामय जीवन के अधिकार की स्थापना का भी संकल्प है। इस दृष्टि की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम समाज के प्रत्येक नागरिक की क्षमता को किस प्रकार पहचानते और सशक्त करते हैं।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दृढ़ नेतृत्व में, आज भारत परिवर्तन की तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। डिजिटल क्रांति से लेकर विश्वस्तरीय अवसंरचना तक, रक्षा आत्मनिर्भरता से लेकर वैश्विक मंचों पर भारत की सशक्त उपस्थिति तक। हर क्षेत्र में नया आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है। यह जागृत भारत है। यह आत्मविश्वासी भारत है। और मैं दावे से कह सकता हूँ, यही समर्थ, समृद्ध और वैश्विक नेतृत्व करने के लिए तत्पर भारत, वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने खड़ा होगा।
आज समय की मांग है कि हम ‘राष्ट्र प्रथम’ को अपने जीवन का धर्म और ‘राष्ट्र सर्वाेपरि’ को अपने प्रत्येक कर्म का आधार बनाएं। यही चेतना आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला और विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति बनेगी। जब 140 करोड़ देशवासी राष्ट्रहित को सर्वाेच्च मानकर आगे बढ़ेंगे, तब भारत केवल प्रगति नहीं करेगा, वह विश्व को दिशा देगा और पुनः ‘विश्व गुरु’ के रूप में प्रतिष्ठित होगा।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर, हम सब मिलकर यह संकल्प लें- हम समान अवसरों वाला समाज बनाएँगे। हम गरिमा और सम्मान की संस्कृति को सुदृढ़ करेंगे। हम आत्मनिर्भरता को जीवन का मूल्य बनाएँगे। हम ऐसा भारत निर्मित करेंगे- जहाँ प्रत्येक क्षमता को अवसर मिले, प्रत्येक प्रयास को सम्मान मिले, और प्रत्येक नागरिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सके।
आइए! हम सब मिलकर संकल्प से सिद्धि की इस यात्रा को नई ऊर्जा दें। इन्हीं शब्दों के साथ, मैं “दिव्य कला मेला” की सफलता के लिए आयोजकों को बधाई देता हूँ तथा सभी प्रतिभागियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
जय हिन्द! जय भारत!