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    14-01-2026:“एक शाम सैनिकों के नाम” समारोह के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जनवरी 14, 2026

    “एक शाम सैनिकों के नाम” समारोह के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    (तिथिः 14 जनवरी, 2026)

    जय हिन्द!

    आज के इस सुअवसर पर मैं आप सभी राष्ट्रभक्तों- हमारे शौर्यवान सैनिकों, सम्मानित पूर्व सैनिकों, उनके गौरवशाली परिजनों तथा समस्त विशिष्ट अतिथियों का लोक भवन में हृदय की गहराइयों से अभिनंदन करता हूँ।

    आज का यह अवसर भावनाओं का संगम है, यह कृतज्ञता का उत्सव है। आज हम वेटरन्स डे मना रहे हैं और कल पूरा देश सेना दिवस के गौरव को नमन करेगा। ये दोनों दिवस हमें यह स्मरण कराते हैं कि राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा, हमारी स्वतंत्रता और हमारा शांतिपूर्ण जीवन- इन सबकी कीमत हमारे सैनिकों ने अपने त्याग, अपने पसीने और अपने प्राणों से चुकाई है।

    किसी राष्ट्र की प्रगति तभी संभव है, जब राष्ट्र सुरक्षित हो। यह सुरक्षा किसी दीवार से नहीं, बल्कि हमारे सैनिकों के कर्तव्यबोध, अनुशासन और अदम्य साहस से सुनिश्चित होती है। सैनिक सेवा कोई साधारण पेशा नहीं, यह एक व्रत है। यह एक साधना है। यह वह जीवन-पथ है, जहाँ व्यक्ति अपने सुख, अपनी इच्छाओं और अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्र-प्रथम को अपना परम धर्म बना लेता है।

    सैनिक का जीवन हमें यह सिखाता है कि अनुशासन में भी गरिमा होती है, कर्तव्य में भी गौरव होता है, और बलिदान में भी अमरता होती है। यही कारण है कि सैनिक सेवा-काल में ही नहीं, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने आचरण, अपने विचार और अपने कर्मों से समाज को दिशा देता है। सैनिकों और पूर्व सैनिकों का सम्मान करना कोई औपचारिक दायित्व नहीं है, यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी, हमारी सामाजिक संवेदना और हमारा संवैधानिक कर्तव्य है।

    हमारा संविधान जिन मूल्यों- कर्तव्य, अनुशासन, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा पर आधारित है, उन्हें धरातल पर साकार करने का कार्य हमारे सैनिक करते हैं। इसलिए यह राज्य का दायित्व है कि वह सैनिकों और उनके परिवारों के साथ हर परिस्थिति में सम्मान, संवेदना और सहयोग के साथ मजबूती से खड़ा रहे।

    इसी भाव से लोक भवन में “एक शाम सैनिकों के नाम” कार्यक्रम की परिकल्पना की गई। यह केवल एक सम्मान समारोह नहीं है, यह कृतज्ञता की वह अभिव्यक्ति है, जो शब्दों से आगे जाकर हृदय से निकलती है। गढ़वाल और कुमाऊँ के अंचलों में आयोजित ‘‘एक शाम सैनिकों के नाम’’ कार्यक्रम की गूँज आज पूरे भारत में सुनाई दे रही है। इन कार्यक्रमों से सैनिक समुदाय तथा राज्य के बीच विश्वास, सम्मान और आत्मीयता का संबंध और अधिक सुदृढ़ हुआ है।

    मेरा मानना है कि हमारे सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी जवानी कुर्बान करने वाले वीरों के लिए सिर्फ एक शाम ही नहीं, बल्कि हर शाम सैनिकों के नाम होनी चाहिए। वह सैनिक ही है जो शून्य से नीचे के तापमान में बर्फीली चोटियों पर और तपते रेगिस्तानों में हमारी ढाल बनकर खड़ा है। इसलिए, हमारी हर सांस में और हर सोच में सैनिकों के प्रति सर्वाेच्च सम्मान होना चाहिए, क्योंकि उनके त्याग के बिना हमारी स्वतंत्रता और विकास की चर्चा अधूरी है।

    उत्तराखण्ड की यह पावन धरती केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि एक महान सैन्य भूमि भी है। यहाँ का कण-कण वीरों की गाथाओं और उनके बलिदानों की गूँज से ओत-प्रोत है। इस माटी ने देश को न जाने कितने रणबांकुरे दिए हैं, जिन्होंने अपनी रगों में बहते लहू से भारत की सीमाओं की रक्षा की है। प्रथम विश्व युद्ध से लेकर कारगिल विजय और आज की आधुनिक रक्षा प्रणाली तक, उत्तराखण्ड के जाँबाज सैनिकों ने अपनी बहादुरी का परचम सदैव बुलंद रखा है।

    गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊँ रेजीमेंट जैसी गौरवशाली सैन्य इकाइयों की कर्मभूमि रही इस वीरभूमि के बलिदान का इतिहास अद्वितीय है। यहाँ का हर दूसरा घर देश की रक्षा के लिए एक समर्पित सैनिक तैयार करता है। तीलू रौतेली के साहस से लेकर बाबा जसवंत सिंह रावत की वीरता तक, यहाँ की गौरव गाथाएं हमें अपनी संप्रभुता के लिए मर-मिटने की प्रेरणा देती हैं। यह वीरों की जननी भूमि हमें सिखाती है कि राष्ट्र सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है।

    मेरे परिजनों,

    आज हम यहाँ उन फौलादी योद्धाओं का वंदन करने के लिए एकत्रित हुए हैं, जिन्हें भारत सरकार ने उनके अदम्य साहस के लिए वीरता पदकों से अलंकृत किया है। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति के शौर्य का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उस महान माँ का सम्मान है जिसने अपना कलेजा राष्ट्र को समर्पित कर दिया, उस परिवार का सम्मान है जिसने त्याग को अपना संस्कार बनाया, और उस शौर्यवान मिट्टी का सम्मान है जिसने ऐसे कालजयी वीरों को जन्म दिया है।

    आज का यह अवसर उन पूर्व सैनिकों के वंदन का भी है, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने अनुभव, अनुशासन और नेतृत्व से उत्तराखण्ड के सामाजिक और प्रशासनिक उत्थान में अद्वितीय योगदान दिया है। सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका समर्पण यह सिद्ध करता है कि एक सैनिक की सेवा कभी समाप्त नहीं होती, वह केवल नया रूप लेकर राष्ट्र निर्माण के कार्यों में निरंतर जारी रहती है।

    आज इस मंच पर इतने अलंकृत योद्धाओं की गरिमामयी उपस्थिति हम सभी के लिए केवल गौरव का विषय नहीं, बल्कि प्रेरणा और अटूट आत्मबल का जीवंत स्रोत है। यह भव्य दृश्य इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सैनिक का सम्मान केवल उसकी वर्दी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सम्मान एक अमिट पहचान बनकर जीवन भर उसके साथ चलता है। राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा का ही परिणाम है कि आज पूरा समाज उनके शौर्य के आगे नतमस्तक है।

    उत्तराखण्ड सैनिक पुनर्वास संस्था हमारे पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए पूरी संवेदनशीलता के साथ कार्य कर रही है। हमारा संकल्प है कि वर्दी उतारने के बाद जीवन की चुनौतियों का समाधान सम्मानजनक, समयबद्ध और मानवीय दृष्टिकोण से हो। इसी उद्देश्य हेतु शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और आजीविका तक की अनेक योजनाएँ धरातल पर उतारी गई हैं। छात्रवृत्तियों, सैन्य स्कूलों में प्रोत्साहन राशि, और दिव्यांग वीरों के पुनर्वास से लेकर पूर्व सैनिक विधवाओं व अनाथ पुत्रियों के विवाह हेतु आर्थिक सहयोग जैसी योजनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि राज्य सरकार अपने प्रहरियों के हर सुख-दुख में उनके साथ खड़ी है।

    राज्य सरकार ने शहीद सैनिकों के आश्रितों के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए अनुग्रह अनुदान राशि में पाँच गुना वृद्धि की है। इसके अतिरिक्त, सैनिक पुनर्वास संस्था द्वारा शहीदों के परिवारों को ₹10 लाख की विशेष सहायता प्रदान की जा रही है, जो हमारी संवेदनशील सोच और राष्ट्र के नायकों के प्रति सर्वाेच्च कृतज्ञता का प्रमाण है। सैनिक की सेवा का मोल नहीं चुकाया जा सकता, लेकिन उनके परिवारों का सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारा पुनीत कर्तव्य है।

    विकसित भारत /2047 के स्वप्न को साकार करने के लिए जो सुरक्षित परिवेश हमें चाहिए, वह इन्हीं जाँबाजों की बदौलत संभव है। आइए, आज हम यह संकल्प लें कि हम अपने सैनिकों और उनके परिवारों का मान-सम्मान केवल विशेष अवसरों तक सीमित न रखकर, इसे अपने जीवन के दैनिक संस्कार का हिस्सा बनाएंगे।

    वीरभूमि उत्तराखण्ड के लिए यह गौरव का क्षण है कि हमारे सैनिक कल्याण विभाग को राष्ट्रीय स्तर पर ‘‘प्रगतिशील राज्य’’ के रूप में सम्मानित किया गया है। रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित नेशनल कॉन्क्लेव 2025 में मिला यह सम्मान पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के पुनर्वास हेतु हमारे अभिनव प्रयासों और प्रभावी नीतियों की वैश्विक गूंज है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उत्तराखण्ड ‘‘सैन्य सेवा और कल्याण’’ के क्षेत्र में देश का पथ-प्रदर्शक बना रहेगा।

    हमारे सैनिकों ने दुर्गम सीमाओं और कठिन परिस्थितियों में जिस अदम्य साहस और कठोर अनुशासन के साथ अनुभव अर्जित किए हैं, वह अद्वितीय है। सेना से सेवानिवृत्ति के पश्चात भी आपकी भूमिका समाप्त नहीं होती, बल्कि एक नई पारी की शुरुआत होती है। मेरा आप सभी पूर्व सैनिकों से आह्वान है कि आप अपनी इसी अनुशासित शक्ति के साथ समाज में व्याप्त ड्रग्स और भ्रष्टाचार जैसी बुराइयों के विरुद्ध एक निर्णायक युद्ध छेड़ें। आपकी सक्रिय भागीदारी से ही हम एक स्वस्थ और शुचितापूर्ण समाज का निर्माण कर पाएंगे।

    राष्ट्र-निर्माण में भी हमारी सैन्य शक्ति का अनुशासन और अटूट देशभक्ति सबसे बड़ी पूंजी है। मेरा अनुरोध कि आप अपनी ऊर्जा और सामर्थ्य को ग्रामीण उत्थान के लिए समर्पित करें, जिससे हमारे गाँव आत्मनिर्भरता की नई ऊंचाइयों को छुएं। आपके इसी योगदान से उत्तराखण्ड एक सशक्त, विकसित और समृद्ध राज्य के रूप में अपनी अलग पहचान बनेगा।

    अंत में, मैं माननीय मुख्यमंत्री जी, सभी विशिष्ट अतिथियों, तथा विशेष रूप से हमारे वास्तविक गौरव- वीर सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। आपकी गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को एक सार्थक उद्देश्य प्रदान करते हुए, इसमें एक नई ऊर्जा और राष्ट्रभक्ति की आत्मा का संचार किया है। हम सभी मिलकर अपनी-अपनी विशेषज्ञता और पुरुषार्थ से उत्तराखण्ड को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे, जिससे ‘‘विकसित भारत /2047’’ के महान लक्ष्य की सिद्धि हो सके।

    इस आशा, अपेक्षा और विश्वास के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
    जय हिन्द!