04-02-2026 : प्रेस क्लब, हरिद्वार द्वारा आयोजित कार्यक्रम में “आजादी के बाद राष्ट्र के पुनर्निर्माण में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका” विषय पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
इस तपोभूमि की पुण्य धरा पर लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ- मीडिया जगत से जुड़े साथियों और आप सभी उपस्थित सुधीजनों के मध्य इस गरिमामय समारोह में उपस्थित होने पर मुझे अत्यंत गौरव और आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है।
हरिद्वार केवल भूगोल नहीं है, यह भारत की चेतना का प्रवाह है। आज इस पुण्य भूमि पर, यह कार्यक्रम उस जीवंत परंपरा का उत्सव है, जिसमें शब्द, विचार, सत्य और जनचेतना एक साथ मिलकर राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करते हैं।
हरिद्वार वह भूमि है, जहाँ गंगा केवल वद नहीं, जीवन-दृष्टि बनकर बहती है, जहाँ साधना आत्मशुद्धि है, और सेवा जीवन का स्वभाव। आगामी वर्ष यहाँ आयोजित होने जा रहा पवित्र कुंभ केवल श्रद्धालुओं का समागम नहीं होगा, यह भारत की सनातन आत्मा, सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता का ऐसा विराट उत्सव होगा, जिसमें विश्व भारत को देखेगा, समझेगा और स्वीकार करेगा।
हरिद्वार को भगवान शिव की तपोभूमि कहा गया है। शिव, जो परिवर्तन के अधिष्ठाता हैं। शिव के हाथ में स्थित त्रिशूल हमें एक गहन संदेश देता है कि- जीवन और राष्ट्र की प्रगति एकांगी नहीं हो सकती। त्रिशूल की तीन धाराएँ हमें एक साथ आगे बढ़ने का आह्वान करती हैं, वह है- आध्यात्मिक उन्नति, सामाजिक समरसता और भौतिक विकास।
यदि केवल भौतिक विकास हो और आत्मा शून्य हो जाए, तो समाज दिशाहीन हो जाता है। यदि केवल अध्यात्म हो और सामाजिक संवेदना न हो, तो वह पलायन बन जाता है। और यदि सामाजिक सरोकार हों, पर विकास का आधार न हो, तो संकल्प अधूरा रह जाता है।
हिंदी पत्रकारिता, यदि इस शिव-तत्व को आत्मसात करे, तो वह केवल समाचारों का संकलन नहीं रहेगी, वह समाज की चेतना की संरक्षिका बन जाएगी। वह सत्य बोलेगी, पर विवेक के साथ। प्रश्न पूछेगी, पर राष्ट्रहित के साथ। और परिवर्तन चाहेगी, पर मूल्यों के साथ। यही संतुलन शिव का संदेश है और यही पत्रकारिता का भी धर्म है।
हरिद्वार की इस तपोभूमि पर, जहाँ गंगा की अविरल धारा हमें निरंतर शुद्धि, सत्य और अपने प्रवाह से हमें निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देती है, आज इस सुअवसर पर, हिंदी पत्रकारिता पर बोलना केवल एक बौद्धिक दायित्व नहीं बल्कि यह एक नैतिक, राष्ट्रीय और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व भी है।
आज का विषय समकालीन भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। “आजादी के बाद राष्ट्र के पुनर्निर्माण में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका”- आज का यह विचारोत्तेजक विषय जितना व्यापक है, उतना ही गहन। और जितना वैचारिक है, उतना ही राष्ट्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है।
साथियों,
स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी, भारत की आजादी केवल अंग्रेजों के जाने का उत्सव नहीं थी। वह एक सभ्यता का पुनर्जागरण, एक आत्मा की मुक्ति, और एक नवभारत के निर्माण का संकल्प थी।
इस ऐतिहासिक परिवर्तन में यदि किसी ने जन-जन के मन में चेतना का दीप जलाया, तो वह थी- हिंदी पत्रकारिता। आजादी से पहले उसने जनआंदोलन को स्वर दिया, और आजादी के बाद उसने राष्ट्र-निर्माण को दिशा दी।
इतिहास साक्षी है कि भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय पत्रकारिता का विकास लगभग समानांतर रूप से हुआ। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, डॉ. भीमराव आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, गणेश शंकर विद्यार्थी और मदन मोहन मालवीय जैसे राजनेताओं एवं विद्वानों ने अपनी लेखनी के जरिए भी आम जन को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ा, अधिकारों के प्रति जागरूक किया और स्वतंत्रता आंदोलन का सक्रिय सहभागी बनाया।
स्वतंत्र भारत के संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। यह लोकतंत्र की आत्मा है। किंतु इस स्वतंत्रता के साथ पत्रकारों पर सत्यनिष्ठा, जनहित के प्रति प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का बड़ा दायित्व भी जुड़ा हुआ है।
मेरे पत्रकार मित्रों,
हिंदी पत्रकारिता भारत की आत्मा की वाणी है। जो भारत के गाँवों की मिट्टी से उपजी है। यह उस माँ की भाषा है, जो अपने बेटे को सीमा पर विदा करती है, उस किसान की भाषा है, जो आकाश की ओर देखकर वर्षा की प्रतीक्षा करता है, और उस युवा की भाषा है, जो सपनों में विकसित भारत देखता है।
हिंदी पत्रकारिता ने ही वास्तव में लोकतंत्र को काग़जों से निकालकर जीवन में उतारा। लोकतंत्र के चार स्तंभों की बात होती है, परंतु भारतीय संदर्भ में मैं कहना चाहूँगा, हिंदी पत्रकारिता लोकतंत्र का स्तंभ नहीं, उसकी चेतना है। यह सत्ता से प्रश्न पूछती है, नीतियों को परखती है, और जनहित को केंद्र में रखती है। यही कारण है कि जब-जब लोकतंत्र डगमगाया, हिंदी पत्रकारिता ने उसे संभाला।
हमारा संविधान केवल विधिक ग्रंथ नहीं, वह राष्ट्र का नैतिक संकल्प है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व- इन मूल्यों को आम जन तक पहुँचाने का कार्य हिंदी पत्रकारिता ने किया। इसने संविधान को केवल वकीलों की भाषा नहीं रहने दिया, बल्कि जन-जन की चेतना बना दिया।
मेरा मानना है कि हिंदी पत्रकारिता सामाजिक सुधार की अग्रदूत रही है। जिसने नारी सम्मान की बात की, शिक्षा के दीप जलाए, स्वास्थ्य और स्वच्छता को राष्ट्रीय विमर्श बनाया, और सामाजिक कुरीतियों पर निर्भीक प्रहार किया।
यह पत्रकारिता केवल घटनाओं की रिपोर्ट नहीं, समाज की आत्मा का दर्पण रही है। वंचितों की आवाज़, लोकतंत्र की ताकत रही है। असली भारत महानगरों में नहीं, गाँवों, पहाड़ों और सीमांत क्षेत्रों में बसता है। हिंदी पत्रकारिता ने उस अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने का प्रयास किया, जिसके पास न मंच था, न माइक। यही इसकी सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है।
भाषा, पंथ और क्षेत्र की विविधताओं के बीच राष्ट्रीय एकता की प्रहरी रही हिंदी पत्रकारिता ने भारत को जोड़े रखा है। संकट के क्षणों में, सीमा पर जवानों के शौर्य से लेकर आंतरिक चुनौतियों तक, इसने राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधा। आपातकाल हो, आपदाएँ हों, या सामाजिक उथल-पुथल, हिंदी पत्रकारिता ने सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाया। और साहस ही पत्रकारिता की असली पहचान है।
उत्तराखण्ड के जनांदोलनों, राज्य निर्माण के संघर्ष, और लोकहित के प्रश्नों को हिंदी पत्रकारिता ने निरंतर स्वर दिया। यहाँ पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, लोकचेतना की साधना रही है। भारतीय दर्शन कहता है- “सत्यमेव जयते”। पत्रकारिता का भी यही मंत्र है। सत्य, विवेक, संयम और लोक कल्याण- जब पत्रकारिता इन मूल्यों से जुड़ती है, तो वह केवल सूचना नहीं देती, दिशा देती है।
मेरे पत्रकार साथियों,
हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि भारतीय पत्रकारिता की जड़ें संवाद, सत्य और कर्तव्य की सनातन परंपरा में हैं। महर्षि नारद, वेदव्यास और हनुमान जैसे आदर्श इसके प्रतीक हैं। मेरा मानना है कि मूल्य-परंपरा से जुड़ी पत्रकारिता कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होती, जो आपसे भी अपेक्षा है।
आज के डिजिटल युग में मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा आधारित तकनीकें नई संभावनाएँ भी ला रही हैं और नई चुनौतियाँ भी। ऐसे समय में फेक न्यूज और सूचना प्रदूषण से सावधान रहना और भी आवश्यक हो गया है।
युवा पत्रकारों से मेरा विशेष आग्रह है कि तकनीक को साधन बनाइए, साध्य नहीं। सत्य, विश्वसनीयता और संतुलन से कभी समझौता न करें। आपकी एक खबर, एक लेख या एक दृश्य समाज की दिशा बदल सकता है, इसलिए आपकी जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि जनता का विश्वास पत्रकारिता से डगमगाता है, तो लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर होती हैं। इसीलिए पत्रकारिता को सदैव यह स्मरण रखना होगा कि टीआरपी से ऊपर राष्ट्रहित, और सनसनी से ऊपर सत्य का स्थान है।
मेरे पत्रकार मित्रों,
मैं आपसे विशेष रूप से आग्रह करना चाहता हूँ कि आप अपनी कलम को केवल करियर का साधन न मानें। आपकी कलम वह शक्ति है, जो समाज की दिशा तय करती है और राष्ट्र के भविष्य की रेखा खींचती है। आपकी लेखनी से विश्वास भी जन्म ले सकता है और भ्रम भी।
इसलिए यह आवश्यक है कि आपका मार्गदर्शक मंत्र सदा स्पष्ट रहे- राष्ट्र प्रथम, सत्य सर्वाेपरि और समाज के प्रति गहरी संवेदना। जब ये तीनों मूल्य आपकी पत्रकारिता के आधार बनेंगे, तभी आपकी आवाज विश्वसनीय भी होगी और प्रभावशाली भी।
आज, जब देश अमृतकाल के दौर में है, और विश्व भारत की ओर आशा से देख रहा है, तब पत्रकारिता से अपेक्षा है कि वह गंगा की तरह निर्मल, शिव की तरह निर्भीक, और त्रिशूल की तरह संतुलित बने। क्योंकि जब पत्रकारिता सत्य की साधना बन जाती है, तो वह केवल इतिहास दर्ज नहीं करती, वह राष्ट्र का भविष्य गढ़ती है।
मैं प्रेस क्लब, हरिद्वार के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों को इस सार्थक आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। मुझे विश्वास है कि यह संस्था भविष्य में भी हिंदी पत्रकारिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्र-निर्माण के संकल्प को और अधिक सशक्त बनाएगी।
प्राकृतिक संसाधनों, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से समृद्ध हमारा उत्तराखण्ड नेशनल डेवलपमेंट और ह्यूमन-सेंट्रिक ग्रोथ का आदर्श मॉडल बन सकता है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हम सभी के सामूहिक प्रयासों से 2047 से बहुत पहले उत्तराखण्ड एक आत्मनिर्भर राज्य बनकर विकसित भारत के निर्माण में सहभागी बनेगा।
मैं आप सभी से यही अपेक्षा करता हूँ कि आप सत्य, संवेदना और संतुलन के साथ अपने दायित्व का निर्वहन करते रहें। हम सब मिलकर आजादी के शताब्दी वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत और विश्वगुरु भारत के निर्माण का सामूहिक संकल्प पूरा करेंगे। जिसके बल पर हमारा भारत विश्व का नेतृत्व करेगा। मुझे विश्वास है कि इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता जनता और शासन के बीच सेतु की भूमिका निभाएगी।
अंत में, हरिद्वार की इस पुण्य भूमि से समस्त पत्रकार बंधुओं को राष्ट्र-निर्माण की इस पावन यात्रा के लिए हृदय से शुभकामनाएं देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
जय हिन्द!